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भाई की एक साली -1

hindi chudai ki kahani

सभी को मेरा नमस्कार। यह मेरी पहली कहानी है, इसे लिखने में बहुत दिक्कतें आई, पर यह ठाना हुआ था कि कुछ भी हो  पाठकों के सामने अपनी यह बात रखूँगा ही। आखिर मेरी यह मेरी जिंदगी की सबसे अहम और प्यारी चुदाई की बात है।

सच कहूं तो मैंने इससे पहले कुछ लड़कियों को चोदा है, पर इस चुदाई की बात ही कुछ और है।

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यह करीब 5 साल पहले की बात है। मेरी भाभी के भाई की शादी थी, जिसमें पूरे परिवार को शामिल होना था। तब मेरे माँ व पिताजी तो नहीं गए,पर मेरे भाई से कहे कि जाते समय इसे भी साथ ले जाना।

इस प्रकार भाई, भाभी उनके बच्चे व मैं ट्रेन से गांव के लिए निकले। भाई की ससुराल में हमारी काफी आवभगत हुई। भाई की शादी के बाद से यह मेरा पहला प्रवास था, इसलिए मेरी काफी पूछ हुई। भाई की एक साली भी थी जो भाभी से करीब 5 साल छोटी थी।

उसका नाम स्नेहा था। यह भाभी से भी ज्यादा सुंदर और चंचल थी। उसका रंग एकदम साफ था, हल्की लालिमा लिए हुए और बढ़िया हाईट, सलवार सूट में उसके औसत से बड़े स्तन और पीछे फूली हुई गाँड उसे बहुत शानदार और दर्शनीय बनाते।

यही कारण था कि भाई की शादी के समय भी कई बराती उसकी झलक पाने बेताब रहे थे।भाभी बताती हैं कि स्नेहा के कारण ही उनके पिता व भाई का गाँव के आधे से भी ज्यादा लड़कों के साथ झगड़ा हो चुका है। न सिर्फ जवान बल्कि अधेड़ भी स्नेहा की झलक देखने आतुर रहते। ऐसा पता चला था कि अब परिवार में उसकी शादी के लिए भी प्रयास किए जा रहे थे।

चलिए यह तो हुई स्नेहा की बात, अब कहानी को आगे बढ़ाता हूँ।

भाई की ससुराल में मैं व भाई जब खाना खाने बैठे तब स्नेहा व भाभी ही हमें भोजन परोसने में लगे, भाभी की माँ रोटी सेंक रही थी। भाई ने स्नेहा को छेड़ा- क्या बात है स्नेहा खूब पिटाई करवा रही हो लड़कों की? अभी बीते सप्ताह ही तुम्हारे भाई मोन्टू ने बेचारे गिरीश को पीट दिया। इसके बाद कितना बवाल हुआ था गाँव में।

स्नेहा बोली- उसने हरकत ही पिटाई खाने वाली की थी, कालेज जाते समय मेरे पीछे गाड़ी टकरा दी थी। मुझे चोट लग जाती तो।

भाई ने कहा- अरे, ये सब तो चलता ही रहेगा, जब तक तेरे हाथ पीले नहीं होंगे, इन मनचलों को तू ही नजर आती रहेगी।

उन्होंने भाभी से कहा- इसकी शादी फाइनल करो जल्दी।

भाभी बोली- अपनी स्नेहा हीरा हैं, मैंने तो सोच रखा है कि इसे अपने जस्सू के लिए ही ले जाऊँगी।

मेरी ओर देख भाभी ने फिकरा कसा- क्यों जस्सू ले चलें न?

स्नेहा की ओर देखकर मैं मुस्कुराया और सिर नीचे कर लिया। पर मैंने गौर किया कि अब स्नेहा मुझे कुछ ज्यादा ही लाईन दे रही है। मैं सही कहूँ तो मन ही मन मैं स्नेहा को कई बार चोद चुका था, यहाँ तक कि मुझे हस्तमैथुन का वास्तविक आनन्द भी उसके ख्यालों में ही आता था। अब भाभी ने उससे मेरी शादी की बात छेड़कर तो जैसे मुझे जन्नत ही दिला दी।

दूसरे दिन सुबह ही इत्तेफ़ाक से स्नेहा को अपनी मौसी के यहाँ हमारे आने का समाचार देने जाना पड़ा, तब वह बोली- उतनी दूर मैं पैदल नहीं जाऊँगी मुझे स्कूटी चाहिए।

उनके घर एक बाईक और एक स्कूटी भी थी, स्नेहा स्कूटी चला लेती थी पर उसके पिता व भाई उसे स्कूटी नहीं चलाने देते थे। इस तरह भाभी के माँ-पिता की काफी देर तक दी गई समझाइश के बाद यह तय हुआ कि स्कूटी मैं चलाऊँगा और स्नेहा मेरे पीछे बैठकर मौसी के घर जाएगी।

भाभी ने जैसे ही मुझसे कहा कि जस्सू तुम्हें स्नेहा को लेकर मौसीजी के यहाँ जाना है, तो यह सुनकर मेरा दिल खुशी से उछ्ल पड़ा, पर खुद को सामान्य रखने की एक्टिंग करते हुए मैंने ऐसे हामी भरी मानो मैं बहु्त आज्ञाकारी हूँ। इस तरह मुझे स्नेहा के साथ अकेले घूमने का मौका मिला।

स्कूटी स्नेहा ने ही बाहर निकाली, तब मैं भी बाहर आ गया था और उसकी सहायता करने पास गया। उस समय बाहर हम दोनों ही थे। तब स्नेहा ने मुझसे धीरे से कहा- मैं गाड़ी चला लेती हूँ, पर ये लोग मुझे इसे चलाने ही नहीं देते।

मैंने कहा- कोई बात नहीं, मेरे साथ चलना, मैं पीछे बैठूँगा, गाड़ी तुम ही चलाना।यह सुनकर वह खुश हो गई और भागकर अंदर तैयार होने गई। उसके बाहर आते ही हम मौसी के घर जाने को निकले। मैंने स्कूटी स्टार्ट किया वैसे ही स्नेहा उछ्लकर पीछे बैठ गई। मेरे कंधे पर हाथ रखकर उसे हल्के से दबाते हुए फुसफुसाई- चलो न जल्दी।

मैंने स्कूटी आगे बढ़ा दी।

बस अगले मोड़ पर ही वह मेरा कंधा दबाते हुए बोली- अब मुझे चलाने दो न।

स्नेहा का साथ पाकर मैं तो खुशी से झूम रहा था और अब मेरे दिल में वर्षों से बंद पड़ी कामनाओं ने फिर से सिर उठाना शुरू कर दिया। मैंने किनारे में गाड़ी रोकी और स्नेहा से कहा- मुझे सबने तुम्हें गाड़ी चलाने देने को मना किया है, पर फिर भी मैं तुम्हें गाड़ी चलाने देता हूँ तो बदले में मुझे क्या मिलेगा?

स्नेहा सामने आ गई और स्कूटी का हैंडल पकड़ते हुए बोली- आप मुझसे जो माँगेगे वह आपको दूंगी।

अब मैं स्कूटी से उतरा और कहा- अच्छे से सोच लो, कहीं बाद में मुकर मत जाना।

उसने कही कि जो बोल दी हूँ वही सच है, जब चाहो आजमा लेना, और जो चाहो माँग लेना।

उसकी बात में मुझे खुला आमंत्रण मिला। वो स्कूटी स्टार्ट करके मुझसे बोली- जल्दी बैठिए न।

मैं उसके पीछे बैठा अब मेरी पैन्ट की फिटिंग बिगड़ने लगी। मैं अपनी सीट से आगे बढ़ा और उससे एकदम चिपककर बैठ गया। मुझे उसकी गाँड पर अपना लंड टिकाने का अद्भुत आनन्द प्राप्त हो रहा था। खुशी के इस झोंके में मैंने अपने हाथ उसकी जांघों पर रखा और हाथ को सलवार के ही ऊपर से आगे पीछे करने लगा। मैं अब तक स्नेहा को देखकर या ख्यालों में चोदकर ही खुश होता था, पर आज उसकी जांघ में हाथ फेरकर तो मानो कोई गड़ा हुआ खजाना मुझे मिल गया। ऐसा लग रहा था मानो मेरे हाथ किसी बेहद नरम संगमरमर पर घूम रहे हों।

और मेरी इस हरकत पर उसके मौन ने मेरा उत्साह दूना कर दिया। अब मैंने आते-जाते लोगों की बुरी नजर से बचने के लिए अपने हाथों को उसकी कुरती के निचले हिस्से से अंदर कर लिया और हाथ को सरकाकर उसकी चूत के ऊपर रख दिया। अब अपने हाथ को और ऊपर करने का ख्याल भी मेरे मन में नहीं आया। अब मेरी उंगलियाँ उसकी चूत की दोनों फांकों को सहला रही थीं। इसके साथ ही मैं उसके कंधे पर अपना चेहरा लाकर उसकी कुरती में झांककर उसके स्तन को देखने का प्रयास करने लगा।

कुरती के अंदर से दूधिया रंग के स्तन को उसने सफेद रंग की ब्रा में कैद करके रखा है, इसकी हल्की सी झलक मुझे देखने मिली। नीचे मेरे हाथ काम कर रहे थे और ऊपर आँखें नयनाभिराम दृश्य को देखने में लीन थी।

तभी स्नेहा बोली- मौसीजी का घर आ गया है, आप सीधे बैठ जाईए।

मैं तुरंत अपनी सीट के आखिर में खिसका और उससे पूछा- कहाँ हैं उनका घर?

“वो इस लाईन का आखिर वाला घर मौसी का है।”

मैं बोला- गाड़ी रोको स्नेहा !

उसने स्कूटी रोकी और पूछा- क्यूँ?

मैं गाड़ी से उतरा व बोला- मेरी पैन्ट की फिटिंग बिगड़ी हुई है, यदि इस हालत में मौसी के यहाँ गया तो वे लोग घर में बता देंगे कि तुम गाड़ी चलाते आई और मैं पीछे बैठकर आया हूँ।

तभी मेरी निगाह स्नेहा पर पड़ी। वह मेरे पैन्ट में छिपे लंड को देख रही थी, जो एकदम तना हुआ था और पैन्ट की जिप यानि करीब-करीब मेरी नाभि तक उठा हुआ था।

वो बोली- अरे कुछ नहीं होगा, आप वो सामने खाली जगह में चले जाइए और अपनी फिटिंग ठीक करके आ जाइए ना।

मैं बोला- नहीं, ये इतनी जल्दी ठीक नहीं होगा, ऐसे में मेरा उनके घर जाना तुम्हारे लिए भी ठीक नहीं रहेगा।

मैंने उससे कहा- तुम वहाँ जाकर यह बोल देना कि मेरा कोई दोस्त यहाँ मिल गया है, जिससे बात करने के लिए मैं रूक गया और तुम्हें भेज दिया। बस कुछ ही देर में वो पहुंचते होंगे। और मैं इसे ठीक करके जल्दी से आता हूँ।

स्नेहा बोली- ठीक है, पर जल्दी आना।

 

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